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Chanakya Niti kavya anuvad Chapter 11

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दान शक्ति, ज्ञान उचित का, धीरता और मृदु बाणी । स्वाभाविक हैं ए चारो गुण, न अभ्यास से पाये प्राणी ।

अपने वर्ग को छोड़कर जाता जो पर वर्गों में । अधर्मी नृप सामा काल के गर्भों में ।

अंकुश करता हाथी वश में, तो क्या अंकुश गज ऐसा है । दीपक दूर है तम को करता, तो क्या दीपक तम जैसा है । वज्र गिराता पर्वत मूल को, तो क्या वज्र गिरि ऐसा है । इन बातों से अर्थ निकलता, उसे बताएं वह कैसा है । जिसमें तेज है रहता जैसा, बलशाली कहलाता वैसा । मोटा पतला होने से वह, बन जाता नहीं ऐसा वैसा ।

10,000 वर्ष बीतने पर कलि में विष्णु धारा त्यागे । उसके आधे पर गंगा जी, ग्रामदेवता उसके आधे ।

गृहवासी नहीं पाता विद्या, दया न करता मांसाहारी । धन का लोभी सत्य न जाने, हो नहीं कामी सदाचारी ।

न साधुता आती दुर्जन में, शिक्षण दो कितना बहु भांति । सींचो पय से अथवा घी से, नीम न पाये मधु की पांति ।

अंतर्मन में पाप भरा हो जिस दुर्जन के, कोटि कोटि तीरथ स्नान न शुद्धि करता । जैसे मदिरा पात्र जलाने पर अग्नि में, शुद्ध न बन के कालिख में ही वृद्धि करता ।

अगर किसी के उत्तम गुण को जो नहीं जाने, वह उसकी निंदा करता है सदा निरंतर । भीलनी मूंगा पत्थर का है हार पहनती, तजती गजमुक्ता को मूरख हेय समझ कर ।

नित्य मौन रह करके करता, 1 वर्ष तक भोजन जो जन । कोटि युग तक स्वर्ग लोक में, पूजा जाता है उसका तन ।

काम, क्रोध, लोभ, अति निद्रा, कौतुक, अतिसेवा, श्रृंगार । स्वादु भोजन, इन आठों से, विद्यार्थी नहीं करता प्यार ।

विप्र वह जो सदा वनवासी, · खाये फल मूल बिन कृषि के । तप ध्यान में रत हो प्रतिक्षण, विप्र वह पाता पद ऋषि के ।

षटकर्मों में सदा निरत जो, एक समय करता जो भोजन । मैथुन करता ऋतु काल में, द्विज कहाता ऐसा ब्राह्मण ।

सांसारिक कर्मों में रत जो, पशु पालन करता जो ब्राह्मण । कृषि और व्यापार करे जो, वैश्य कहाता ऐसा ब्राह्मण ।

तेल, कुसुम, नील, लाख वगैरह, मधु, घी, मदीरा बेंचे ब्राह्मण । जीव जन्तु का मांस बेचता, शूद्र कहता ऐसा ब्राहमण ।

दंभी स्वार्थी, द्वेषी, क्रूर, छली, बिगाड़े जो पर कार्य । मृदुभाषी केवल ऊपर से, विप्र कहाता यह मार्जार ।

बावली, कुआं, तालाब, वाटिका, नष्ट भ्रष्ट करता जो ब्राह्मण । देवालय आदि जो नाशे · म्लेच्छ कहाता ऐसा ब्राह्मण ।

गुरु धन देव धन हरता जो, पर स्त्री गमन की चाल । जीवन जीता सब जीवों में, विप्र कहाता यह चांडाल ।

धन-धान्य व खाद्य पदार्थ का संग्रह न कर, पुण्यात्मा कहते हैं करें दान सुपात्र देखकर । कर्ण, बलि, विक्रमादित्य को कौन न जाने, दान के बल से अजर अमर हैं दुनिया माने । बूंद बूंद कर संग्रह करती मधु मधुमक्खी, न स्वेच्छा से देती, न मधुपान है करती । मधु उठाकर जब ले जाता कोई दूजा, हाथ पांव मल मल कर विलाप है करती ।

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