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Chanakya Niti kavya anuvad Chapter 13

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उज्जवल कर्म को करके जीना, एक मुहूर्त भी होता श्रेष्ठ । दोनों लोक से कर्म हो उल्टा, कल्प क्षण भी जीना नेष्ट ।

बीता समय का सोच न करना, न भविष्य की चिंता धर्म है । वर्तमान में रहना जीना, कहती नीति यही कर्म है ।

देवता, सत्पुरुष, पिता, होते खुश स्वभाव शील से। भाई बंधु खान पान से, पंडित खुश हो वाक्य दान से ।

लक्ष्मी तृण सा लगती जिनको, प्राप्ति पर नम्र करती मन को । ऐसा जीवन अद्भुत यह मन, मिलता केवल साधु जन को ।

जहां है प्रीति, भय वहीं है, प्रीति दुख का कारण बनती । प्रीति का परित्याग करे जो, रहता सुख से व्यथा न पलती ।

दुख आने के पहले व दुख आने पर, शीघ्र सोचे उपाय सदा वह सुखी रहता । भाग्य भरोसे रहने वाला निर्बुद्धि है, घोर कष्ट में रहता दुख की ज्वाला सहता ।

राजा धर्मी, प्रजा धर्मी, पापी राजा प्रजा हो पापी । राजा सम तो प्रजा सम हो, राजा गुण अपनाती प्रजा । अतः राजा से बनती प्रजा, जैसा राजा वैसी प्रजा ।

धर्म हीन का जीवन कैसा, जिंदा शव है घूमता जैसे । मरने पर भी धर्मात्मा, अमर रहे मरता नहीं वैसे ।

धर्म कर्म और मोक्ष काम ये, नहीं एक भी रहता जिनमें । बकरी गर्दन पर स्तन सा जीवन निष्फल बनता उनमें ।

पर यश अग्नि की ज्वाला में, नीच हमेशा जलते रहते । अक्षम है यह पद पाने में, इस कारण से निंदा करते ।

मन का बंधन विषय वासना, मुक्ति जब इससे हटता मन । जन में मन नहीं उसका सब कुछ, बंधन मोक्ष का कारण भी मन ।

रमात्मा की ज्ञान ध्यान से, तन अभिमान निकलता है जब । मन जाता है जहां जहां पर, बने समाधि वहां वहां पर ।

मनचाहा सब सुख नहीं है कोई पाया, अपने हाथ में न होकर यह ईश्वर पर है। जितना पाते हो उतने में सुख से रह कर, संतुष्टि में जीने से ही उत्तम नर है।

शत-शत गौओं के रहने पर, बछड़ा ढूंढे निज माता को । वैसा ही जो जैसा करता, फल उसका ढूंढता कर्ता को ।

कार्यक्रम नहीं स्थिर जिनका, न सुख पाते वन या जन में । जन जलता संगति से उनकी, वे जलते संगति को वन में।

कुदाल के खोदन से ज्यों, प्राप्ति होती है भूतल जल । गुरु सेवा से शिष्य भी वैसे, प्राप्ति करता गत विद्या तल ।

अपने कर्म का फल भोगे नर, बुद्धि चलती कर्म हो जैसा । बुद्धिमान जन बिना विचारे, करते काम न ऐसा वैसा ।

एक अक्षर भी देने वाला, गुरु को जो नर नहीं माने । कुत्ता योनि की भोग करके, चांडालों में जन्म बिताए ।

युग अंत में मिटे सुमेरु, कल्प अंत में सातों सागर । साधु जन अपने निश्चय से, कभी नहीं डिगते अंगुल भर ।

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