Chanakya Niti kavya anuvad Chapter 5

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गुरु है अग्नि द्विज जनों का, वर्णों का गुरु विप्र कहाये । पति है गुरु त्रिया मन का अभ्यागत गुरु विश्व कहाये ।

4 तरह से कनक परीक्षा, घिस काट व पीट, गर्म कर । इसी तरह नर देत परीक्षा, त्याग, शील, गुण और कर्म कर ।

जब तक भय है पास न आया, भय से डरना है ! नर तब तक । आये भय से निडर होकर, लड़ना तन में बल है जब तक ।

एक ही गर्भ व एक नक्षत्र में, जन्मे जन शील एक न पाए । एक पेड़ के बेर और कांटा, भिन्न गुण से भिन्न कहाये ।

निस्पृह न इच्छा रखता है, पद पदार्थ अथवा अधिकार की । स्पष्ट वक्ता बने न वंचक, बोले न बोली मूर्ख प्यार की ।

मूर्ख विज्ञ से दीन धनी से, सधवा से विधवा को वैर । कुलीन जनों से वेश्या, गणिका, रखती द्वेश मानती गैर ।

पर अधिकार से धन छिन जाता, आलस्य से नहीं विद्या आती । कमी बीज की नाशे खेती, बिन नायक सेना मर जाती ।

अभ्यास से विद्या आए, कुल शील से छिप न पाए । गुण से सज्जन परिचय पाए, क्रोध आंख से प्रकट हो जाए।

धन से धर्म, योग से विद्या, मृदुता से राजा की रक्षा | सुघड़ गृहणी से गृह सजता, चमके चम चम घर का नक्शा ।

वेद के तत्वज्ञान को झूठा कहने वाला, शास्त्र विधान को करें कलंकित जो कुविचारी । शांत पुरुष की शांति में बाधक जो बनता, झेले वह नर कष्ट क्लेश व्यथा अति भारी ।

दान से दीनता, दुर्गति शील से, प्रज्ञा नाश करे अज्ञान । भावना से भय दूर है होता, कहता ज्ञान, सुने सुजान ।

नहीं काम सा व्याधि दूजा, नहीं मोह सा शत्रु कोई । नहीं ज्ञान सा सुख है जग में, नहीं क्रोध सा अग्नि कोई ।

जन्म लेता मनुज अकेला, मरण भी उसका मात्र अकेला । सुख-दुख भोगे स्वयं अकेला, नर्क मोक्ष भी पाए अकेला ।

ब्रह्म ज्ञानी को स्वर्ग तृण सा प्राण तृण सा शूर के आगे । नारी तृण सा जितेंद्रिय को, तृण जगत निस्पृह को लागे ।

विद्या सखा है प्रवासी का, घर में मित्र सदा से नारी । औषधि रोगी का हितू है, धर्म मरे पर हो हितकारी ।

सागर में वर्षा तृप्त को भोजन, दान धनी को व्यर्थ आयोजन | दिन में दीपक व्यर्थ हो जाता, ऐसा कर्म न अर्थ है पाता

न बल कोई अपना बल सा न जल दूजा शुद्ध जलद सा । तेज न कोई नेत्र नयन सा प्रिय न वस्तु अन्न भोजन सा ।

निर्धन धन की इच्छा रखता, पशु रखता वाणी की आशा । स्वर्ग मनुज की अंतिम चाहत, मोक्ष देवता की अभिलाषा ।

सत्य के बल से तपता सूरज, सत्य बल से है टिकी धारा । सत्य बल कारण बेहते पवन हैं, सत्य में स्थित सब कुछ सारा ।

लक्ष्मी, प्राण, जीवन, घर वस्ती, यह सब चंचल, ए अस्थिर । मात्र धर्म ही अचल अटल है, नश्वर जग में ये ही स्थिर ।

नाऊ नर में चतुर कहाये, खग में ये गुण कौवा पाए । चौपाया में धूर्त सियार, नारी में मालिन होशियार ।

यज्ञोपवीत कराने वाला, अन्नदाता, जन्म का दाता । भय का नाशक, विद्या दाता, ये सब पंच पिता कहलाता।

नृप की पत्नी गुरु की पत्नी मित्र की पत्नी, ससुर की पत्नी । पिता की पत्नी, पांच ये माता, याद ये रखना, विज्ञ बताता ।

See also  अध्याय तीन: चाणक्य नीति

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