Chanakya Niti kavya anuvad Chapter 16

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न ईश्वर का ध्यान किया जो, नहीं धर्म का लिया सहारा । नहीं स्वर्ग के लिए किया कुछ, न पारलौकिक जन्म सुधारा । न कठोर स्तन रमणि का, न जांघों के सुख को पाया। न नितंब का किया आलिंगन, लौकिक जीवन व्यर्थ गंवाया । न पारलौकिक, न ही लौकिक, जीवन सुख है जिसने पाया ।

कुल्हाड़ी सा इस पुत्र को, माता ने निरर्थक पाया । 1 त्रिया का चरित्र है अद्भुत, एक निष्ठ नहीं होती नारी । एक को देखती मधुर प्यार से, अन्य से करती बातें प्यारी । तीसरा को ह्रदय में रखती, त्रिया प्रीति एक न होती ।

ऊपर मुग्ध है कामनी, मूर्ख इस भ्रम में पड़ता । बना खिलौने की चिड़िया सा, उसके वश हो नाचा करता ।

कौन है जिसने धन पाकर नहीं गर्व किया है, कौन है विषयी जिसको संकट नहीं सताया । नहीं कोई जो सदा सम्मानित राजा से हो, जमा नहीं कोई जिसको मृत्यु नहीं खाया । सुंदर नारी के रूप पर नहीं कौन लुभाया, रूपसी तन ने किसके मन को नहीं जलाया । कौन नहीं खोया गौरव है याचक बनकर, कौन नहीं दुख भोगा है दुर्जन संग रह कर ।

हिरण कनक का देखा न कोई, नहीं सुना न बनाया है कोई । लालच वश भये रघुवर कुबुद्धि, विनाश काले विपरीत बुद्धि ।

गुण से उत्तम कहलाता नर नहीं बैठ ऊंचे आसन पर । गरुण नहीं बन जाता कौवा, बैठ महल के उच्च शिखर पर ।

गुण से पूजा जाता है नर सभी जगह पर, न नर पूजित होता जग में धन के बल से । पूर्ण चंद्र न पूजा जाता न पूजित है, चंद्र दूज के दुर्बल होकर भी पूजित है ।

जिसके गुणों की प्रशंसा करे सब प्राणी, निर्गुणी होने पर भी वह गुणी कहाए । अपनी प्रशंसा करने वाला गुणी भी, इंद्र तुल्य गुणी होकर भी लघुता पाए ।

गुण विवेकी जन के संग ही पाए शोभा, गुण हैं पाते नहीं विवेक नहीं है जिनको । सुंदर जचते हीरा, रत्न और सब मोती, जड़ा है जाता शीशे संग जब इन सबको ।

ईश्वर साही गुणी क्यों नहीं, बिन आश्रय नहीं पाए चोटी । पत्थर से है रत्न कहाता, जब सोना संग सजता मोती ।

अति कष्ट से, धर्म त्याग से, शत्रु द्वारा नष्ट मान से । प्राप्त धन नहीं सुखी बनाए, नहीं जिलाए मान शान से ।

उस धन से क्या लाभ सती सा, केवल अपने पति को भाए । धन वही जो हो वेश्या सा, सब जन सब नर के हित आए ।

जीवन, धन, आहार की वस्तु, उत्तम त्रिया के प्यारों से । तृप्त हुआ नर और न होता, और न होगा इन चारों से ।

दान, यज्ञ, होम, बलि ये नष्ट हो जाते, पर सुपात्र को दान नहीं कभी होता निष्फल । जीव सभी पर दया और कृपा जो करता, अभय दान यह नष्ट न होकर देता है फल

हल्का तृण, तृण से हल्की होती रुई, रुई से भी हल्का होता नीच भिखारी । हल्की वायु भी न छूती इस हल्का को, मांग न ले ये भिक्षुक नीच कहीं कुछ भारी ।

मान को खोकर जीने से है मरना अच्छा, प्राण त्याग में दुख होता थोड़ी देर केवल । मान भंग होने पर दुख होता है पल पल, जीता जग में सुख से है नर मान के बल ।

मीठे वचन संतुष्टि है जन की, बोलो इसे क्या कमी है वचन की ।

इस संसार विषैला वृक्ष में, अमृत सा दो ही फल आते । जिसको अपनाते साधु जन, सज्जन संगति अच्छी बातें ।

दान, तप, अध्ययन का जो अभ्यास किया है पूर्व जन्म में । इन सब कर्मों के कारण ही रहे कुशल से इस जन्म में ।

पुस्तक की विद्या जो नही जीभ पर धन अर्जित वह जिस पर नहीं वश, काम न आये दुर्दिन में, इनसे नहीं यश, इन पर नहीं कस ।

See also  अध्याय चार: चाणक्य नीति

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