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Chanakya Niti kavya anuvad Chapter 1

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करता नमन मैं विष्णु प्रभु को, सिर मैं झुकाता हूँ त्रिलोकी को । राजनीति बतलाता हूँ भू को, उद्धृत है सब शास्त्रों से जो ।

योग्य-अयोग्य शुभाशुभ कर्म में, शास्त्र ज्ञान से अंतर पाये । अर्थशास्त्र का ज्ञान हो जिनको, उत्तम नर में गिना जाये ।

लोक भलाई जिसमें है वह बात कहूँगा, समझ जिसे मूरख नर भी सर्वज्ञ कहाये । जिस कुपात्र के गर्दन पर गर सिर नहीं है, ज्ञान कहाँ से उसके सिर में जमने पाये ।

मूरख को उपदेश न देते, दुष्टों को नहीं पालन पोषण । नहीं साथ रहते दुष्ट के, अपनाते ये पंडित सा जन ।

भार्या दुष्टा शठ से यारी, नौकर नकचढा हो जिनका । बसता घर में सर्फ जहाँ पे, मरा हुआ जीवन है उनका ।

धन का संग्रह बहुत जरूरी, अति दुर्दिन में करता रक्षा । धन से बढकर त्रिया रक्षा, सर्वोत्तम है आत्म सुरक्षा ।

बड़े 2 के पास भी आपत्ति आ जाती है, लक्ष्मी तजती, संचित धन भी नष्ट हो जाये । अब विरंची की माया यह सब कुछ करती, दुर्दिन हेतु अत: हमेशा धन को बचायें ।

जहाँ निरादर न जीविका हो, न लाभ विद्या, न भाई – बंधु । वहाँ कदापि क्षण नहीं रहना, रहना नहीं जन, रहना नहीं तू ।

जहाँ न राजा, न वैद्य सरिता, विप्र नहीं वेदपाठी जहाँ पे | धनी नहीं जन, जहाँ न ये सब, एक दिवस नहीं रहना वहाँ पे ।

न परलोक का भय नहीं लज्जा, नहीं त्याग, सम्मान नहीं है। नहीं राजभय नहीं शीतलता, बसने योग्य स्थान नहीं है।

दुख में परखें भाई-बंधु, सेवक सेवा के आने पर । संकट में हो मित्र परीक्षा, पत्नि वैभव के जाने पर ।

बंधु वही जो साथ निभाये, में दुख में आतुर जब होता मन । श्मशान, दुर्भिक्ष इत्यादि, संकट जब रचते शत्रु जन । संकट आये राजाकृत, बने सहायक वही मित्र ।

जो निश्चित को छोड़ जगत में, अनिश्चित की ओर दौड़ता । निश्चित बन जाता अनिश्चित, अनिश्चित कब का है निश्चित ।

रूपा गुणी कन्या संग, ब्याह अगर हो वह सर्वोत्तम । नीच अवगुणी सुरूपा संग, ब्याह कभी भी न है उत्तम ।

त्रिया, राजकुल के लोगों पर, नदी, शस्त्र जो रखता है जन । नख – सींग वाले जीवों पर, कभी न आस्था रखना हे जन !

विष से अमृत, नीच से विद्या अगर मिले यह भी है उत्तम । सोना भी अशुद्ध जगह का, ले लेना नीति सर्वोत्तम । दुष्ट कुल की त्रिया रत्न भी, अपनाने में पाप नहीं है ।

विद्यायुक्त कुशल नारी को, अपनाने में शाप नहीं है। 4 भोजन दूना करती नारी है पुरुषों से, लज्जा चौगुनी, साहस छ: गुना होता । बाहर से उनकी आँखों में काम न दिखता, काम का वेग मगर उनमें अठगुना होता ।

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